कविताएँ : अशोक सिंह

बचपन

तीस साल पहले
झाड़ी में गुम हो गयी एक गेंद

एक गुड़गुड़ी
जो उम्र की ढलान से गुड़गुड़ाकर
खाई में जा गिरी
और जिसे सींक से
निकालने की कोशिश में लगा हूँ आज भी
एक खेल
गिल्ली-डंडा का
जिसकी गिल्ली उछलकर
गाँव के स्कूल में बैठे
गुरुजी के माथे पर जा गिरी
और डंडा
जिसे गाँव की गली में छोड़कर
डर से भाग आया मैं शहर

आम के बगीचे में लगा एक झूला
जिसकी रस्सी टूटकर
झूल रही है अभी भी
पिता के सपनों में
(Poem’s of Ashok Singh)

बाजी लगाने की होड़ में हारकर
कटकर जा गिरी एक पतंग
जो ठूंठ पेड़ से अटकी
झूल रही है हवा में आज तक

ताखे पर रखी एक उदास गुड़िया
जिसकी उदासी
अभी-अभी थककर सोयी
मेरी बिटिया की नींद में गिर रही है़…

एक गुब्बारा
जो अभी-अभी अचानक हाथ से फूट गया
और जिसके फूटने की आवाज
पास खड़े बच्चों की खिलखिलाहट में
गुम हो गयी़…..

खट्टी-मीठी यादों-सी वह इमली
जिसकी मिठास
समय की धूप में सूखकर उड़ गयी
और खटास बची रह गयी जीवन में
(Poem’s of Ashok Singh)

दादी के अँचरे से खोलकर
चुरायी गयी वह चवन्नी
जो चली गयी दादी के साथ ही
उसके चार आने सेर
मिठाई की बातों की मिठास से घुलकर

अचानक हाथ से छूट़…..
गिरकर फूट गया स्मृतियों का वह गुल्लक़.
जिसमें इकट्ठी वर्षों की खुशियाँ
फर्श पर सिक्के के साथ बिखर गईं…..
और खनक़……
बाजार के शोर में गुम हो गयी।

मैं बचाना चाहता हूँ
इस वक्त जबकि लगी है आग
इस छोर से उस छोर तक़…..
(Poem’s of Ashok Singh)

लोग बचा रहे हैं
अपनी-अपनी दुनिया
अपना-अपना घर

मुझे डर है
कहीं जलकर राख न हो जाएँ मेरी कविताएँ

कविताएँ जल गईं
तो जल जायेंगी कई तस्वीरें
राख हो जायेंगे
आग लगाने वाले लोगों के तहखाने तक
पहुँचने के नक्शे

क्या रह जायेगा फिर शेष
जब जला देंगे लोग छीनकर मुझसे
तुम्हारी तस्वीर, तुम्हारी चिट्ठियाँ !
(Poem’s of Ashok Singh)

मैं चाहता हूँ बचाना
चिड़ियों का घोंसला
तितलियों के पर
औरतों के सिर की चादर
माटी की गंध
बच्चों के मैदान

थोड़े से अनब्याहे सपने
थोड़ी सी बची-खुची उम्मीद
थोड़ी सी हवा
थोड़ी सी धूप
रोने के लिए थोड़ी सी जगह
और अपने आप से बतियाने के लिए
थोड़ा सा एकांत

फिलहाल
यह जो अभी-अभी दंगे के हादसे से
डर कर भागा भयभीत कबूतर है
मेरी छत की मुंडेर पर आकर बैठा
मै उसे बचाना चाहता हू…

क्योंकि मुझे डर है
कि यह जो लगी है आग
इस छोर से उस छोर तक
उसमें कहीं झुलस न जायें उसकी पाँखे !

कहीं कुछ टूट रहा है़….

हम दौड़ते जा रहे हैं
अंधाधुंध अनुकरण की दौड़ में
पानी की विशाल सतह पऱ….
(Poem’s of Ashok Singh)

न मालूम क्यों
हमें कोई आभास नहीं है
डूबने के खतरों का

बरसात के बुलबुलों की तरह
मिट जाने के हादसे का

भय की किसी भयानक गहरायी तक समाती
हमारी संवेदनशीलता का

फिर भी हम
दौड़ते जा रहे हैं
लम्बी कतार में…..

हम दौड़े जा रहे हैं…..
और दौड़े जा रहे है हमारे साथ
हमारे सपने, हमारी इच्छाएँ….
हम दौड़े जा रहे हैं
और यह भूल रहे हैं
कि हमारी इस अंधी दौड़ में
कहीं कुछ टूट रहा है
टूट रहा है किसी का कुछ
हमारे पाँव की तेज रफ्तार में….
(Poem’s of Ashok Singh)

बोलो
यह चुप रहने का वक्त नहीं है
बोलो ! और दहाड़ते आतंक के बीच फटकारकर बोलो !

संभव है एक दिन भोगनी पड़े तुम्हें
बहुत कुछ बोलने की हिम्मत बटोरते
कुछ न बोल पाने की पीड़ा

उस जगह पहुँच कर
कुछ कर सकने के बारे में मत सोचो
जहाँ पहुँचकर सरसों के दाने-भर रह जाता है आदमी

जो चुप हैं उन्हें चुप रहने दो
उसकी गहराती चुप्पी ही तुम्हारे बोलने की ताकत है

उसका इंतजार मत करो जिससे मिलकर
तुम्हारी मुट्ठियों में कसमसाता गुस्सा पिघल जाता है

बोलो ! और कुछ इस कदर बोलो
जिस कदर आज तक
किसी ने किसी को बोलने का साहस नहीं किया

अपने समय की गहराती चुप्पी के खिलाफ बोलो
और वह सब कुछ बोलो जो
आज तक कभी बोला नहीं गया

बोलो ! चाहे बोलने में जितना भी विरोध सहना पड़े
मगर बोलो और बार-बार बोलो !
बोलो कि अच्छे दिन आने में
अब कितने वर्ष और लगेंगे ?

इतना बोलो ! इतना बोलो !
कि सामने वाला चुप्पी तोड़कर बोले
कि बहुत बोलते हो तुम !
(Poem’s of Ashok Singh)

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